भगवती गायत्री का आवाहन और पंचमहायज्ञ अनुष्ठान | Invocation of Bhagwati Gayatri and Panchmahayagya ritual
भगवती गायत्री का आवाहन और पंचमहायज्ञ अनुष्ठान
गायत्री मंत्र का महत्व और विधि
भगवती गायत्री, जिन्हें वेदमाता भी कहा जाता है, वैदिक संस्कृति में आदिशक्ति और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं। उनके आवाहन, जप, और पंचमहायज्ञ का अनुष्ठान हमारे आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गायत्री देवी का आवाहन
स्नान के पश्चात, "आयातु वरदा देवी" मंत्र से भगवती गायत्री का आवाहन करें।
मंत्र:
- आवाहयेत्ततो देवीं गायत्रीं वेदमातरम्।
आयातु वरदा देवीत्यनेनैव महेश्वरीम् ॥
इसके बाद पाद्य, आचमन, और अर्घ्य प्रदान करें। फिर तीन बार प्राणायाम करते हुए, बैठे या खड़े होकर, गायत्री मंत्र का जप करें।
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लिंग पुराण : भगवती गायत्री का आवाहन तथा जप, सूर्य की प्रार्थना, सूर्य सूक्तों का पाठ, |
जप की विधि:
- एक हजार, पांच सौ, या एक सौ आठ बार गायत्री मंत्र का उच्चारण करें।
- मंत्र जप के बाद, सूर्य को अर्घ्य प्रदान करें और "उत्तमे शिखरे देवी" कहकर देवी का विसर्जन करें।
सूर्य प्रार्थना और सूक्त पाठ
गायत्री जप के बाद, सूर्य देव की प्रार्थना करें।
सूर्य प्रार्थना मंत्र:
- उदुत्यं जातवेदसम्। चित्र देवानाम्।
इसके बाद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेद से संबंधित सूर्य सूक्तों का पाठ करें और तीन बार सूर्य देव की परिक्रमा करें।
देव-ऋषि-पितृ तर्पण की विधि
तर्पण करते समय अलग-अलग जल का उपयोग करें:
- देवताओं के लिए: पुष्पयुक्त जल
- ऋषियों के लिए: कुशयुक्त जल
- पितरों के लिए: तिल और गंधयुक्त जल
तर्पण विधि:
- देवताओं के लिए: अंगुलियों के अग्रभाग से जल अर्पण करें।
- ऋषियों के लिए: कनिष्ठा अंगुली का उपयोग करें।
- पितरों के लिए: दाहिने अंगूठे से तर्पण करें।
तर्पण के समय यज्ञोपवीत की स्थिति:
- देवताओं के लिए: सव्य (कंधे के ऊपर)
- ऋषियों के लिए: निवीती (गर्दन के चारों ओर)
- पितरों के लिए: अपसव्य (कंधे के नीचे)
पंचमहायज्ञ का अनुष्ठान
पंचमहायज्ञ हमारे ऋणों की पूर्ति का साधन है। यह पांच यज्ञ हैं:
- ब्रह्मयज्ञ: वेदों और शास्त्रों का अध्ययन।
- देवयज्ञ: अग्नि में हवन।
- पितृयज्ञ: पितरों का श्राद्ध।
- भूतयज्ञ: सभी जीव-जंतुओं के लिए अन्न का दान।
- मनुष्ययज्ञ: अतिथियों को अन्न और जल का दान।
भस्म स्नान और मंत्र स्नान
पवित्रता के लिए भस्म स्नान और मंत्र स्नान किया जाता है। इसके द्वारा शरीर और आत्मा दोनों की शुद्धि होती है।
महत्व
इस विधि से अनुष्ठान करने वाला व्यक्ति सभी देवताओं, ऋषियों, पितरों और परमात्मा की कृपा प्राप्त करता है। यह जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति और शांति का मार्ग प्रदान करता है।
यह संपूर्ण प्रक्रिया हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास के लिए एक संपूर्ण साधन है। इसे श्रद्धा और विधिपूर्वक करने से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं।
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