लिड्डार्चन विधि: आत्मा और शरीर की शुद्धि के लिए स्नान और अभिषेक की प्रक्रिया | Liddarchan Vidhi: Process of bathing and anointment for purification of soul and body
🌿 लिड्डार्चन विधि: आत्मा और शरीर की शुद्धि के लिए स्नान और अभिषेक की प्रक्रिया 🌿
लिड्डार्चन विधि का उद्गम
ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि महादेव की लिड्डस्वरूप में पूजा किस प्रकार की जानी चाहिए। सूत जी ने बताया कि इस विषय में देवी पार्वती के प्रश्नों के उत्तर में भगवान शिव ने इस विधि का वर्णन किया। शैलादि (नन्दी) ने इसे ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार को बताया, और फिर व्यास जी ने इसे विस्तृत किया।
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स्नान विधि का महत्त्व
भगवान शिव ने तीन प्रकार के स्नानों का वर्णन किया है:
- वारुण स्नान: जल में स्नान।
- अग्नि स्नान: भस्म स्नान।
- मंत्र स्नान: मंत्रों से आत्माभिषेक।
स्नान की प्रक्रिया
- जल स्नान:श्रद्धा और शुद्ध भावना से सरोवर, नदी, या कुंड में स्नान करें।स्नान से पहले मिट्टी, गोमय, तिल, और पुष्प से शरीर की शुद्धि करें।स्नान करते समय “उद्धृतासि वराहेण” और “ऋतं च सत्यं च” जैसे मंत्रों का जाप करें।
- भस्म स्नान:“गन्धद्वारां दुराधर्षाम्” मंत्र का जाप करते हुए कपिला गाय के गोमय का लेप करें।शुद्ध जल से स्नान कर मलिन वस्त्र त्यागें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- मंत्र स्नान (आत्माभिषेक):तीर्थ जल से “रुद्र सूक्त”, “पवमान सूक्त”, और “पंचब्रह्म मंत्र” का जाप करते हुए आत्माभिषेक करें।इस दौरान भगवान शिव के पंचमुख स्वरूप का ध्यान करें।
भावना की शुद्धि का महत्त्व
- केवल बाहरी शुद्धि से शुद्धि संभव नहीं है। मनुष्य का चित्त निर्मल और भावना शुद्ध होनी चाहिए।
- ज्ञानरूपी सूर्य का प्रकाश ही तमोगुण को हटाकर चित्त को शुद्ध कर सकता है।
आत्माभिषेक और पूजा प्रक्रिया
- तीर्थ जल का उपयोग:गोश्रृंग, पलाश पत्र, कुश, और पुष्प से जल छिड़कें।जल से त्रिनेत्र और पंचमुख भगवान शिव का ध्यान करते हुए अभिषेक करें।
- आचमन और प्रदक्षिणा:तीन बार आचमन करें और जल को अभिमंत्रित करें।शुद्ध मन से तीर्थ जल में डुबकी लगाएं और प्रदक्षिणा करें।
लिड्डार्चन विधि का फल
- यह विधि सभी पापों का नाश करती है।
- इसे करने से आत्मा, मन, और शरीर की पूर्ण शुद्धि होती है।
- भगवान शिव की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उपसंहार
लिड्डार्चन विधि भगवान शिव की दिव्य उपासना का एक अनोखा मार्ग है। इसमें शारीरिक और मानसिक शुद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति के उपाय समाहित हैं। इसे श्रद्धा और विधिपूर्वक करने से साधक को पवित्रता और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
शिवाय नमः!
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