पहाड़ी कविता "खुदेड़" की यह कविता।
तू काहे का #पहाड़ी रे!!!
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मंडवे की रोटी तूने खायी नहीं है।
कछ्बोळी तूने कभी चबाई नहीं है।।
'#बल' और '#ठैरा' तू भाषा में लगता नहीं है।
उचेणु तू अब चढ़ाता नहीं है।
तू काहे का पहाड़ी रे "खुदेड़" ?
मंडाण तू नाचता नहीं है,
देवता तू पूजता नहीं है।।
काफल के हडले तू चबाता नहीं है!!
मोटा आनाज अब तू पचाता नहीं है।।
तू काहे का पहाड़ी रे "खुदेड़" ?
शादियों में धोती पहनता नहीं है,
पहाड़ी हिसाब से तू रहता नहीं है।।
साहपाटा बरात में तू ले जाता नहीं!!
पहाड़ी भोजन तू बनाता नहीं।।
पिछोड़ा तू महिलाओं को ओढ़ता नहीं!!
रस्म कंगन की शादी में तू तोड़ता नहीं।।
काहे का पहाड़ी रे "खुदेड़" ?
बारात में ढोल-दमो तेरे आते नहीं है,
मांगल, गाळी अब शादी में तेरी गाते नहीं है।।
पितगा अब तू बनाता नहीं है!!
बेदी अब तू सजाता नहीं।।
तू काहे का पहाड़ी रे "खुदेड़" ?
भाषा तू बोलता नहीं है।
अपनों के अत्यचार पर खून तेरा खौलता नहीं।।
इमानदारी तुझमे अब दिखती नहीं!!
मुजफ्फरनगर कृत्य की पीड़ा तुझे चुभती नहीं।।
न्याय के लिए तू लड़ता नहीं!!
संस्कृति का विकास तू करता नहीं।।
तू काहे का पहाड़ी रे "खुदेड़" ?
संकट चौद्सी का ब्रत तू मनाता नहीं।
हरेला में जौ तू उगाता नहीं।।
फूल देई में फूलों से देळी तू सजाता नहीं!!
पंचमी में गीत तू गाता नहीं।
उत्रेणी में खिचड़ी तू पकाता नहीं!!
बग्वाल इगास तू मनाता नहीं।।
भेला तू खेलता नहीं!!
पहाड़ के चार दुःख तू झेलता नहीं।।
तू काहे का पहाड़ी रे "खुदेड़" ?
कब तक ये झूठा पहाड़ी नाम का तगमा, लेकर घूमता रहेगा।
पहाड़ का सब कुछ छोड़कर,
खुद को पहाड़ी कहता रहेगा।।
है रे "खुदेड़"
तूने तो अन्य लोगों की तरह,
पहाड़ को पिकनिक स्पॉट बनाया है।।
बस चंद रोज आराम के लिए यहाँ बिताया है।।
अगर खुद को पहाड़ी कहता है तू!!
तो पहाड़ी संस्कृति, भेषभूषा, भाषा बोली,
खानपान, और तीज त्यौहार को भी अपनाना होगा।
वरना खुद को पहाड़ी नहीं कहना होगा।
समझा रे "खुदेड़"
Credit: प्रदीप रावत "खुदेड़"................😊😊
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